दार्जिलिंग और सिक्किम यात्रा – भाग 1

भागलपुर से दार्जिलिंग यात्रा 



गर्मियोंकेछुट्टीयोंमेंघूमनेजानेकाकार्यक्रमबनरहाथा | कहाँजाएकहाँनहींघरमेंबसयहीचर्चाचलरहीथी| वैसेअभीलंबासमयथा, परहमारेभागलपुरकीबातहीनिरालीहै| कहींभीजानाहोअगरतीनचारमाहपूर्वमेंट्रेनोंमेंआरक्षणनहींलियातोबसफिरभूलजायेकिआपकोपटनातकभीजानेकेलियेकिसीट्रेनमेंआरक्षणमिलेगी| प्रत्येकट्रेनमेंआनेऔरजानेवालोंकातांतालगारहताहै| खैर, हमारेख्वाबोँकोतीनमहीनेपहलेहीपंखलगनाशुरूहोगये| हमारीश्रीमतीजीभीकाफीउत्साहितऔरखुशनजररहींथी| वैसेआपकोबताताचलूँ, श्रीमतीजीभीकमघुम्मकडनीनहींहैं, शादीसेपहलेहीइन्होंनेतोकोलकता, पुरी, दिल्ली, आगरा, मथुरा, वृन्दावन, हरिद्वार, ऋषिकेश, देहरादून, मसूरी, वैष्नोदेवी, जम्मू, शिरडीऔरअंतमेंलिस्टमेंजोनामहैवोसबकेबसकीबाततोबिल्कुलभीनहींऔरवोहैअमरनाथयात्रा, करचुकींहैं|


हमारापूरीऔरभुवनेश्वरजानेकाकार्यक्रमआरक्षणनहींमिलपानेकीवजहसेजाड़ेमेंटलचुकीथीइसीबीचमैंनेतयकरलियाकिपहलेअपनेआसपासस्थितस्थलोंकीयात्राकरूँगा, बजायलंबीयात्राकेइसकेदोफायदेथे, पहलातोअपनेआसपासकोजाननेऔरसमझनेकामौकामिलेगाऔरदूसराछोटेबच्चोंकोलेकरलंबीयात्रापरजानेमेंपरेशानीबहुतहोतीहैबच्चेसाढ़ेपाँचसालऔरसाढ़ेतीनसालकेहैंलंबीयात्रामेंयेऊबजातेहैंऔरफिरउधममचाकरजीनामुश्किलकरदेतेहैं, खासकरलंबीट्रेनयात्रामेंराततोकटजातीहैपरदिनमेंयेनाकोदमकरदेतेहैंकभीएककोऊपरकीबर्थचाहियेतोकभीखिड़कीवालीसीट, बाहरकानजारादेखनेकेलिये।एकनेनाकोदमकरखिड़कीकीसीटहथियायीनहींकीअबदूसरेकाभीरोनाधोनाशुरूकभीकोईनीचेजारहाहैतोकभीऊपरकभीप्यासलगीतोकभीशौचालयजानाहै, एक अभीआयानहींकीदूसरेकोभीजानाहैसबसेबड़ीदिक्कतमुझेतबमहसूसहोतीहै, जब कोईसहयात्रीबारबारघूरकरदेखनेलगतेहैं, जो मुझेबेहदअसहजकरदेताहैजोकिएकआमसमस्यामुझेलगतीहैवातानुकूलितडब्बेमेंयात्राकरनेमेंएकतोसन्नाटाफैलारहताहै, कोईकिसीकीओरदेखतातकनहींऔरजबछोटेनटखटशैतानसन्नाटेकोतोड़तेहैंतोफिरकुछमहानुभावकोयेगवारानहींगुजरताइनसभीबिन्दुओंपरगौरकरनेकेबादहमनेदार्जिलिंगऔरसिक्किमकीयात्रापरजानातयकरलियारात्रिमेंबैठेऔरसुबहसुबह  न्यू जालपाईगुड़ीपहुँचगये|

श्रीमतिजीनेपहलेहीअपनेपिताश्रीकोहमाराकार्यक्रमबतादियाऔरवोलोगभीसाथचलनेकोतैयारहोगयेथेमतलबहमलोगदोबच्चोंऔरमेरीमाताश्रीसहितपाँचलोगथेअबमेरेससुरजीऔरसासुसहितहमसातलोगहोगयेटिकिटऔरआनेजानेकेकार्यक्रमबनातेबनातेश्रीमतिजीनेअपनीननद(मेरीबहनजी, लखनऊ) औरअपनीबहनजी(जोमेरीजेठसासलगेंगी, महाराष्ट्र) सेभीसाथचलनेकेलियेपूछलियामेरीबहनजीनेसाफसाफनाकरदियाऔरश्रीमतीजीकीबहनजीसाथजानेकोझटसेतैयारहोगयीलेकिनवोबिनापतिकेहीसाथचलेंगी, उनकेदोनोंबच्चेऔरमेरेबच्चेहमउम्रहीहैंअबतीनलोगऔरबढ़गयेऔरहमलोगकुल6लोगऔर4बच्चेहोगये| लेकिन4 – 4अतिउद्दंड़ीबन्दरोंकोसंभालनाएकमुश्किलकामहोनेवालाथाइसयात्रामेंमेरातोयेसोचकरहीसरचकरानेलगा, पहलेहीमेरेदोबन्दरउत्पातमचानेमेंक्याकमथे, जो दो और शामिलकरलियेश्रीमतिजीनेमैंमनहीमन  श्रीमतीजी को कोसनेलगाखैर, वातानुकूलितडब्बेमेंआरक्षणकरवाकर, हमलोगदार्जिलिंगऔरसिक्किमकीवादियोंमेंसपनोंकीउड़ानभरनेलगे।अबशुरूहुआलम्बेइंतज़ारकासिलसिला, क्योंकिहमनेतीनमहीनेपहलेआरक्षणकरवायाथापरमजेकीबातयेथीकिइतनापहलेआरक्षणलेनेपरभीएकबर्थप्रतीक्षासूचीमेंहीथा


आखिर27मई, 2018यानिसुहानेसफरपरचलनेकादिनभीहीगया, श्रीमतीजीनेसारीतैयारीपूरीकरलीथी, भारतीयरेलवेकीट्रेनहमेशाकीतरहलेटलतीफीसेचलरहीथी हमेंलगभगचारघंटेस्टेशनपरबितानापड़ा ट्रेनरात्रिकेदोबजेआयीऔरहमलोगअपनेबोरियाबिस्तरलेकरट्रेनमेंसवारहोगये मेरेसासूजीऔरश्रीमतीजीकीबड़ीबहनअपनेदोबच्चोंकेसाथपहलेसेहीअपनेअपनेसीटपरनींदकेआगोशमेंसमायेहुएथे सिर्फससुरजीहीहमाराइंतजारकररहेथे| सीटपरगिरतेहीकबनींदगयीपताहीनहींचला

सुबहतड़केचायवालोंकीचायचायकीकर्कशआवाजनेनींदखराबकरदीऔरगुस्साभीरहाथाशायदयेखीजइसलियेभीज़्यादाथी, क्योंकिमुझेचायसेकुछलेनादेनारहतानहीं आजतकमैंनेचायकोहाथतकनहींलगाया, लबोंतकलगानेकीबातहीजुदाहै| सुबहपाँचबजेभीकोईचायकासमयहै, अच्छीभलीनींदखराबकरदीचायचायकरके  | हमारी ट्रेनलगभगसाढ़ेआठघंटेविलम्बसेसुबहकेपाँचबजेकेबदलेदिनमें1:30 मिनटपरन्यूजालपाईगुड़ीपहुंची, हमारापूराप्लानफेलहोचुकाथा| स्टेशनपरउतरतेहीदार्जिलिंगजल्दपहुँचनेकोजीमचलरहाथा, कासपंखहोतेतोहमबिनातनिकदेरकियेपरियोंकीतरहउड़जाते| परहमेंतोअबटैक्सीलेनीपड़ेगीमुझे फिल्म का वो गाना याद आ रहा था –
“पंख होते तो उड़ आती रे, रसिया ओ जालिमा. तुझे दिल का दाग दिखलाती रे.
यादों में खोई पहुची गगन मे, पंछी बन के सच्ची लगन में.
दूर से देखा, मौसम हसी था, आनेवाले तू ही नहीं था. रसिया, ओ जालिमा |”


न्यू
जालपाईगुड़ीमेंस्टेशनकेबाहरहीटैक्सीस्टैंडहै, हमनेपासहीकेएकशाकाहारीहोटलमेंखानाखाया| खानाबसपेटभरनेलायकथा| खानेकेबादटैक्सीस्टैंडमेंमोलतौलकरहमने3200 मेंएकबोलेरोकीऔरआगेकीयात्रा, यानिदार्जिलिंगकीओररवानाहोगये  | न्यू जालपाईगुड़ीटैक्सीस्टैंडमेंदलालोंकाबोलबालाहै| हमें4000और 4500 केरेटसुननेकेबावजूद3200मेंएकबोलेरोमिलगई| यहाँसिर्फबोलेरोयासुमोजैसीहीगाडियाँचलतीहैं| बस के बारे में मुझे कोई जानकारी नहीं मिल पाई, वैसे भी हमें जाना तो गाड़ी बुक करके ही था  | पहलेन्यूजालपाईगुड़ीसेहीदार्जिलिंगकेलियेटॉयट्रेनचलतीथी, जोअबबन्दपड़ीथी|



अभीहमलोगकुछदूरनिकलेहीथेकिमौसमनेअपनामिजाजबदलनाशुरूकरदियाअचानकसेबादलछागयाऔरमूसलाधारबारिशहोनेलगीपहाड़ीइलाका, टेढ़ेमेढ़ेरास्ते, तेजगतिसेआतीगाड़ियोंऔरमूसलाधारबारिसकीवजहसेठीकसेकुछदिखाईनहींदेरहाथा, जिसकीवजहसेहमेंकुर्सियांगमेंरोहिणीचायबगानकेपासएकछोटीसीखानेपीनेकीजगहपररूकनापड़ावहीबगलमेंएकहोमस्टेकाबोर्डभीनजररहाथामुझेछोड़सबनेहरीभरीसुन्दरवादियोंमेंघोरबारिसकेसाथचायकामजालियाबच्चोंकीतोमौजहोआईथी, बारिसऔरबिजलीकड़कनेकीआवाजपरगाड़ीमेंबैठेबैठेउत्साहितहोकरशोरमचारहेथेबारिसथमनेपरमैंनेआसपासकामुआयनाकिया, क्योंकिड्राइवरमहोदयखानाखारहेथेजहाँतकऊपरदेखपारहाथा, चायकेबगानऔरऊँचेऊँचेपहाड़नजररहेथेसड़ककमचौड़ीथी, सो छोटेबेटेकोलेकरज्यादादूरनहींनिकलपायाक्योंकिसड़कपरतेजगतिसेगाड़ियोंकाआवागमनहोरहाथा


आसमान आश्चर्यजनकरूपसेसाफहोचुकाथाऔरअद्भुतरूपधारणकियेथासफरफिरसेशुरूहुईअबतकअंधेरेनेसबकुछअपनेआगोशमेंसमेटलियाथा, बस गाड़ियोकीलाइटहीसड़कओरपड़रहीथी| रास्तेमेंकईजगहजामलगाहुआथाहमलगभग7 बजेदार्जिलिंगपहुंचे, जहाँबिल्कुलअँधियारेकासाम्राज्यथाहमेंपताहीनहींचलरहाथाकिहमदार्जिलिंगस्टेशनकेपासखड़ेहैं, जहाँसेइतनीप्रसिद्धटॉयट्रेन(खिलौनागाड़ी) चलतीहैकारणपूछनेपरपताचलाकिदार्जिलिंगकीमार्केटसंध्या6 बजेबंदहोजातीहै, जो की मेरेलियेघोरआश्चर्यसेकमनहींथागर्मियोंकीछुट्टियोंकीवजहसेसैलानियोंकीइतनीभीड़भाड़कीहोटलोंमेंकमरेमिलनामुश्किल, लेकिनचारोंओरसन्नाटा।सचकहूंतोमनहीमनसोचरहाथा, कहींड्राइवरहमेंशहरकेबाहरहीतोछोड़करतोनहींभागरहाबारिसफिरशुरूहोचुकीथीऔरहमारासामानजोगाड़ीकेऊपररक्खाथाथोड़ागीलाहोचुकाथाड्राइवरनेकवरतोकियाथा, पर मैंनेउसेखुदसेदेखानहींथा, शायदउसनेठीकसेढकानहींथाइसवजहसेसामानगीलाहोगयाऔरसबमुझेकोसरहेथेगाड़ीसेनीचेउतरतेहीठंडकाएहसानहोनेलगायात्रापरनिकलनेवालेदिनहमारेशहरकातापमान41° डिग्रीसेल्सियसथाऔरअबहमलोग11°डिग्रीसेल्सियसमेंपहुंचगयेथेजल्दीसेहमनेगर्मकपड़ेडालेऔरसबकोदार्जिलिंगस्टेशनपरबिठाकरमैंससुरजीकोसाथलेकरहोटलदेखनेनिकलपड़ायहाँभीदलालोंकीभरमारथी, दार्जिलिंगस्टेशनकेठीकसामनेसेशुरूहोकरमालऔरगाँधीरोडतकहोटलहीहोटलहमनेहोटलोंखाकछाननीशुरूकीऔररेटसुनकरतोजैसेहमेंतारेनज़रआनेलगेबिल्कुलथर्डग्रेडहोटलसामनेथे, उसमेंभी3000 केनीचेकमरेउपलब्धनहींथे| कमरेभीऐसेजिसेकबूतरखानाकहनाहीठीकहोगा| गर्मीयोंकीछुटियाँचलरहीहै, होटलखचाखचभरेपड़ेथे| कुछदेरभटनेकेबादएकठीकठाकऔरसाफसुथरेहोटलमेंकमरेकाइन्तजामहुआ| कमरेमेंपहुंचकरहाथमुहँधोकरहमनेवहीँखानाखायाक्योंकिऔरकोईविकल्पभीनहीं था, सारेरेस्टोरेंटबन्दपड़ेथे| संध्या6बजेकेबादकोईउम्मीदहीनहींकीआपकुछजरूरीवस्तुभीमार्केटमेंढूंढपाये| यहाँकीयूनियनकाफीमजबूतहैऔरयेलोगसरकारकी9बजेतकमार्केटकोखुलेरखनेकेप्रस्तावकोकईबारठुकराचुकीहै|


आगे जारी है ….



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8 thoughts on “दार्जिलिंग और सिक्किम यात्रा – भाग 1”

  1. चक्रपाणि जी यहां तो हम पहिले भी टिप्पणी कैले रही लगता है उ टिप्पणिय के अपना चक्र चला के काट दिहले क्या?
    बहुत ही अच्छा विवरण जी, पढ़कर ऐसे लगा जैसे हम आपके साथ इस यात्रा पर हैं। वैसे हम कभी दार्जिलिंग नहीं गए हैं और न ही कभी जाने की लालसा रखते हैं क्योंकि लोगों से सुना है कि ये बहुत महंगी जगह है और उन लोगों की कही-सुनी बातों पर आपके इस लेख ने मुहर भी लगा दिया। 4000 में तो हम दिल्ली से चेन्नई, तिरुपति, फिर चेन्नई, रामेश्वरम, कन्याकुमारी, त्रिवेंद्रम सब घूम डाले और 3200 केवल बोलेरो के। बाय बाय दाजिर्लिं अब कभी तेरा नाम भी नहीं लूंगा।

  2. नहीं अभयानंद भाई ये कैसे हो सकता है कि आप जैसे दिग्गज की टिपण्णी को कोई काट दे, और हम तो ये कतई नहीं कर सकते ऐसा | दुःख भरी दास्ताँ है ये भी | वो ब्लॉग ना जाने कैसे दिखना ही बन्द हो गया था | कुछ लोगों ने मेसेज कर बोला ब्लॉग खुल नहीं रहें हैं | फिर नाम से स्पेल्लिंग में बदलाव कर उसी नाम का दुसरा ब्लॉग शुरू करना पड़ा | यही वजह है आपकी टिपण्णी गायब होने का | अन्य जगहों से थोड़ा महगां तो है पर ये खर्च ६ लोग और ४ बच्चें के साथ हुई है | ऊपर से गर्मियों की पीक सीजन में बिना पूर्व बुकिंग के निकाल पड़े थे बेपरवाह | जिसकी वजह से होटल में जेब कट गई |

  3. बिल्कुल सही कहा आपने की न्यू जलपाईगुड़ी स्टेशन के बाहर टैक्सी माफियाओं के राज है…ब्रह्मपुत्र मेल अक्सर बहुत late होती है…चाय चाय मुझे चाय बहुत पसंद है…चलिये आखिर दार्जीलिंग शाम को पहुच ही गये

  4. जलपाईगुड़ी जाने वाली अधिकतर ट्रेन लेट ही रहती है….एक बार मैं महानंदा से गया था…जो 12 घंटे लेट…दूसरी बार नार्थ ईस्ट से वो 10 घंटे लेट ….. बुरा हाल है…. बच्चे तो शैतानी करते ही है ….मानते कहाँ है …. सीजन में होटल की मारा मारी रहती है इन जगहों पर ….. हम भी यही सब भुगत चुके है ….. बढ़िया रही आपकी यात्रा

  5. टैक्सी माफिया और टूर ट्रवेल के दलालों से बच निकलना की कला अगर यहाँ काम नहीं आई तो फिर फसे. प्रतीक भाई हमारे रूट पर ज्यादा आप्शन नहीं है तो मज़बूरी हो जाती है. ब्रह्मपुत्र मेल बिल्कुल खटारा ट्रेन बन चुकी है.

  6. रितेश भाई, हमारे रूट पर ज्यादा आप्शन ही नहीं हैं तो ब्रह्मपुत्र मेल बेस्ट च्वाइस होता है, पर यह इतनी लेट-लतीफी से चलती है कि पूछिए मत. महानंदा, नार्थ ईस्ट पकडें के लिए मुझे नवगछिया जाना पड़ेगा, जो खुद ही दुरूह कार्य है. वैसे भी इनका हाल भी बुरा ही है…… बच्चों की शैतानी तो हमने झेली – चार चार बंदरों की इस ट्रिप में….. होटल ने तो हमें बेदम कर दिया, बुरे फसें थे.

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