Naini Lake

नैनीताल की एक शाम – An Evening in Nainital

तालों का शहर नैनीताल – Lake City Nainital  भाग – 6

गर्मियों की छुट्टियों में बच्चों से साथ की गई नैनीताल यात्रा के वृतांत को भाग – 1 से पढ़ने के लिये तालों का शहर – नैनीताल से शुरू करें. पिछले भाग “नैनी ताल में क्या करें?”में आपने पढ़ा नैनीताल की सबसे बड़ी आकर्षण नैनी झील में हमने बोटिंग का मजा लिया और यह एक यादगार बोटिंग में शामिल हो गई. चलिए आगे चलें –

बोटिंग के उत्साह और शानदार नैनीझील के नजारों ने हमारी सारी थकान मिटा दी थी और नई स्फूर्ति का अनुभव हो रहा था. तिब्बत मार्केट की बढती रौनक देख विचार आया क्यों न आज तिब्बत मार्केट के साथ माल रोड के शाम के रौनक का हिस्सा बन आनन्द लिया जाये. वैसे भी नैनीताल की सबसे बड़ी आकर्षण नैनी झील और माल रोड की शाम की रौनक ही तो है. मैंने जैसे ही मार्केट घूमने का विचार माताश्री और श्रीमतिजी के सामने रखा दोनों झट से तैयार हो गए. तो हम पंत पार्क चौराहे की ओर बढ़ने के बजाय फिर से नैना देवी मन्दिर की ओर चल पड़े. वैसे तो असली तिब्बत मार्केट नैना देवी मन्दिर के पास ही है, पर धीरे-धीरे विस्तार लेते-लेते सड़क किनारे सजने वाली दुकाने पंत पार्क चौराहे तक पहुँच जाती हैं. शाम के पांच बज चुके थे और फिर से ठण्ड का एहसास होने लगा था और मै ठण्ड से सिकुड़ने लगा था. श्रीमतिजी ने स्वेटर लेने की बात फिर दुहराई, मैंने भी हाँ में हाँ मिला दी. आखिर ठण्ड तो लग ही रही थी, पर खरीदने से बचना भी चाह रहा था ताकी सामान का बोझ न बढ़ जाए.

मार्केट में कहीं कपडे तो कहीं लकड़ी के बने सजावट के सामान, कहीं हैट तो कहीं मैट, कहीं झुमके और बाली, तो कहीं होठों की लाली, कहीं बच्चों की टॉय तो कहीं-कहीं चीज बड़ी रोचक और मजेदार. तिब्बत मार्केट की रौनक और भीड़ में हम गुम होते चले जा रहे थे. समझ न पा रहा था कि मै भीड़ का हिस्सा था या खुद भीड़. माताश्री और श्रीमतिजी कभी स्वेटर देखते तो कभी कुछ. स्वेटर पसंद न आये, ज्यादातर बड़े साइज की थी और कीमत भी बेहिसाब. धीरे-धीरे दोनों महिलाओं के हाथों में कुछ सामान दिखने लगे. कुछ बच्चों ने और खिलौने खरीद लिये. धीरे-धीरे हम सजी दुकानों को देखते पंत पार्क चौराहे होते माल रोड पर आ चुके थे. माल रोड की छटा ही निराली थी, अलग ही रौनक.  

माल रोड पर भी कुछ कपड़ों की दुकाने थी, उसमें भी स्वेटर के लिये झाँका गया. पर एक स्वेटर ही तीन से पांच हजार के रेट के थे, तो चुपचाप निकल लिये. आगे और कई स्वेटर की दुकाने थी, जिसमें लौटते हुए देखने की बात हुई और हम लोग एक तरह – तरह की सजी कैंडिल की एक दुकान में घुसे. इतनी तरह की कैंडिल तो मैंने अपनी जिंदगी में न देखी थी. विचित्र – विचित्र आकार और प्रकार के कैंडिल. कैंडिल की अद्भुत दुनिया में हम काफी देर खोए रहे. खुसबू ऐसी की कोई भी दीवाना हो जाए. वहाँ से कुछ कैंडिल की खरीददारी हुई और फिर माल रोड को नापने शुरू किया.

माल रोड पर ज्यादातर लड़कियों और जोड़ों की भीड़ थी. और कारण था खाने-पीने की दुकानों की कतार. कहीं मोमोज, तो कहीं तरह-तरह के पकौड़े-कटलेट, कहीं काफी तो कहीं चाय, कहीं चॉकलेट तो कहीं आइसक्रीम, कहीं मोमोज तो कहीं नूडल्स. अगर आप चटोरे हैं और स्ट्रीट फ़ूड देखकर लार टपकने लगता है तो माल रोड आपके लिए ही है, बस जेब पर ऊँचे रेट थोड़े भारी पड़ते हैं. एक उबला भुट्टा या मक्का भी वहाँ पचास का, तो बाकि चीजों का आप अंदाजा लगा लीजिए. स्ट्रीट फ़ूड कितना जेब काटेगी ये आपके चटोरे जीभ की लम्बाई और उससे टपकती लार पर निर्भर करता है. डिनर लेने से सबने मना कर दिया, क्योकिं खाना ही हमने काफी लेट खाया.

चलते – चलते मैं और श्रीमतिजी आगे निकल आए. एक जगह सड़क के किनारे मोमोज वाले के पास भीड़ जमी थी, मैंने भी झाँका. मोमोज वाले ने बोला- “खा के देखिए अगर अलग स्वाद न हो और बढ़िया न लगे तो पैसे मत देना”. अब ऐसे चैलेंज के बाद किस फूडी के कदम आगे बढ़ने वाले थे. तो हमने भी दो प्लेट का आर्डर दिया और माल रोड पर किनारे-किनारे पेड़ के नीचे बैठने के लिये बने कुर्सियों पर बैठ अपने पारी आने का इंतजार करने लगे. लोग एक प्लेट खाली कर दूसरी प्लेट भी निपटा दे रहे थे. हमारे पीछे नैनी झील की अलग ही रौनक थी, झील के पानी में चमचमाती लाईट अलग ही माहौल बनाए थी. पर मैंने कैमरे से इसे कैद करने की नाकाम कोशिश की पर बात न बनी.

खैर, मोमोज की प्लेट जबतक हाथ आई माँ और बच्चे भी पहुँच चुके थे. मोमोज का स्वाद सच में ला लाजवाब था. मोमोज का ऐसा स्वाद मुझे आजतक न मिला कहीं. श्रीमतिजी खुद मोमोज घर में बनाती हैं, पर वो भी चकित थी इस अलग ही स्वाद से. मोमोज वाले से क्या-क्या डाला जानने के लिये पूछा पर वो बेचारा इतना व्यस्त था की बात न हो पाई. हमने चालीस रूपये प्रति प्लेट से हिसाब से पैसे के साथ बेहतरीन स्वाद के मोमोज खिलाने के लिये उसका धन्यवाद किया. मोमोज वाला गदगद हो गया. 

ठण्ड और बढ़ गई और मैं गर्मी के लिये बार-बार दोनों हाथों को आपस में रगड रहा था. बच्चे दादी के साथ फिर से खिलौनों की दुकान में सर खपा रहे थे. मैं और श्रीमतिजी स्वेटर देखने के लिये आगे बढ़ गए. पर मेरा कुराफाती मन अब कुछ और ही देख और सोच रहा था. कहाँ तो मैं स्वेटर खरीदने की सोच रहा हूँ और यहाँ तो गोरी-चिकनी सुन्दर बालाएँ बिल्कुल छोटे-छोटे शोर्ट्स में माल रोड की रौनक बनी हुई हैं.

एक स्वेटर की दुकान के बाहर पहुँच कर मैंने स्वेटर न खरीदने का अपना निर्णय श्रीमतिजी को सुना दिया, वो आश्चर्य से मुझे घूर रही थी. श्रीमतिजी ने अचानक से बदले फैसले पर सीधा प्रश्न दागा  –

श्रीमतिजी – क्या हो गया? आप तो सबसे पहले स्वेटर ही खरीदने वाले थे?

मैं – नहीं, अब जरूरत नहीं.

श्रीमतिजी – क्यों, क्या हुआ?

मैं – बस ऐसी ही.

श्रीमतिजी – जरूर कोई बात है. बताओ क्या हुआ ?

मैं – बात….. बात क्या है, बात…. कुछ नहीं. ठण्ड वैसे कुछ ज्यादा तो नहीं. सामने देखो.

श्रीमतिजी – क्या?

मैं – मंडराती तितलियाँ….

श्रीमतिजी – तितलियाँ ….???

मैं – वो तितलियाँ…. मतलब….. लड़कियों को देखो कितनी छोटे-छोटे शोर्ट्स में घूम रही हैं.

श्रीमतिजी – (विचित्र ठंग से घूरते हुए) तो…….?

मैं – तो क्या ….. मतलब ठण्ड नहीं है. जब तितलियों को नहीं लग रही ठण्ड तो मुझे क्यों लगेगी? बेकार में सामान का बोझ बढेगा और बजट बिगडेगा वो अलग. वापसी में उसे ढोना भी है मोहतरमा. यहाँ गोरी-चिकनी सुन्दर बालाएँ बिल्कुल छोटे-छोटे शोर्ट्स पहने तितलियों की तरह मंडरा रही हैं. मौसम को धता-बता कर माहौल गर्म किये हुए है. जब इनको ठण्ड नहीं लग रही तो मै ही निरा मुर्ख हूँ, जो स्वेटर खरीदकर और सामान का बोझ बढ़ा लूँ.

श्रीमतिजी काफी देर तक घूरती रही फिर मोनालिसा टाइप की मुस्कराहट देते हुई बोली- ठीक है कल सुबह तक देख लेते हैं, अगर कल भी ठण्ड लगी तो फिर सबसे पहला काम स्वेटर लेना ही होगा.

मैं- तुम्हें लेना है तो ले लो.

श्रीमतिजी – कल तक इंतजार कर लेते हैं.

हम आगे बढ़ रहे थे, पर श्रीमतिजी अजीब व्यवहार करने लगी. सामने से जैसे ही कोई छोटे छोटे शोर्ट्स में गुजरती तो मुझे घूरकर फिर वही मोनालिसा वाली मुस्कराहट दे देती. समझ न आ रहा था, गुस्सा रही है या मजे ले रहीं हैं. अब पुरे रास्ते यही हमारी मस्ती का कारण बना रहा.

धीरे – धीरे थकहार कर हम कैलास पर्वत पर पहुँच गए. (जिन्होंने इस वृतांत को शुरू से न पढ़ा को बता दूँ माताश्री ने रेस्ट हाउस को जिसमें हम ठहरे हुए थे कैलाश पर्वत नाम दिया था) थोड़ी देर बाहर लगे झूले पर बैठे कैलाश पर्वत पर चढ़ने में चढ़ी सांसों पर काबू पाने की कोशिश करते रहे. यहाँ से भी पहाड़ों पर जलती लाइटों और झील में लाइट की परछाई बहुत ही सुन्दर लग रही थी. थोड़ी देर बाद हम उठकर कमरे में चले गए और कपडे बदल बिस्तर पर गिरे ही थे कि नींद के आगोस में समां गए.

आगे अगले भाग में ….

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6 thoughts on “नैनीताल की एक शाम – An Evening in Nainital”

  1. I have fond memories of Nainital. Been there with family a couple of times or more. It has always been lovely! But now I feel it’s too crowded, so I’d like to explore other less popular places around it.

    1. Renuka Walter,
      I visited first time found good. But yes, it’s already crowded around. But when people gathered in holidays, it’s becomes real mess.

      I also enjoyed less crowded places to explore. We all traveler are like minded, as I feel.

      Thanks for coming on blog & give time, write sweet comment.

  2. ह्म्म्म 😊 तो घूरती आँखों और मोनालिसा मुस्कान ने आगे जा कर क्या आग 🔥 लगाई ? जल्द बताएँ, मतलब लिखें कि कैसी हुई पिटाई 😂😂😂

    1. सुनीता जी,
      यात्रा में मानसिक रूप से साथ चलने के लिए धन्यवाद. मोनालिसा की मुस्कान को समझना इतना आसान कहाँ, पूरी दुनिया आज भी उलझी है तो मैं भला अदना सा इंसान कैसे जान पाउँगा इस मोनालिसा की कुटिल मुस्कान का राज. सच कहूँ तो समझ न आ रहा था श्रीमतीजी मन में हँस रही थी या खींस निकाल नहीं पा रही थी. जो भी हो वापसी में हमारे हिमालय पर्वत पर चढाई कर गेस्ट हाउस तक पहुँचते-पहुंचते इतना थक गई कि साब भूल गई.

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